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Naveen Joshi
Devbhoomi Developers (Hindi, Paperback, Joshi Naveen)

Naveen Joshi Devbhoomi Developers (Hindi, Paperback, Joshi Naveen)

Sale price  Rs. 199.00 Regular price  Rs. 249.00

यह उपन्यास सन 1984 से 2016 तक के उत्तराखंड के ताज़ा इतिहास की पृष्ठभूमि में आधुनिक विकास की विसंगति, प्राकृतिक संसाधनों के असीमित दोहन, राजनीति की कुरूपता और गाँवों के उजड़ने की कहानी कहता है। यह उपन्यास ‘चिपको आंदोलन’ के बाद कुमाऊँ में छिड़े जबरदस्त 'नशा नहीं रोजगार दो' आंदोलन से शुरू होता है, जिसमें जनता की, विशेषकर महिलाओं की 'चिपको' जैसी व्यापक भागीदारी थी। उपन्यास टिहरी बांध बनने और उसके विरोध में हुए आंदोलन की कहानी के साथ बताता है कि बड़े बांध कैसे एक समूचे समाज और उसकी सभ्यता-संस्कृति को दफ़्न कर देते हैं। इसमें 'पंचेश्वर बांध' की प्रक्रिया शुरू होने से उपजी आशंकाओं की व्यथा-कथा भी है। 'पृथक उत्तराखंड आंदोलन' और तराई के भूमिहीन किसानों की लंबी लड़ाई की कहानी भी यह कहता है। उत्तराखंड राज्य बनने के संघर्ष की कहानी के साथ यह भी बताया गया है कि कैसे वह धीरे-धीरे जनता के सपनों से दूर होता गया और कैसे आधुनिक विकास और बड़ी पूँजी का गठजोड़ जनता को अपने जल-जंगल-जमीन से विस्थापित करता गया। आज भी प्राकृतिक संसाधनों का व्यापक दोहन जारी है। गाँवों से पलायन इतना अधिक हो गया है कि वहाँ 'भूत' रहने लगे हैं। सामाजिक-राजनैतिक संगठनों और नेताओं के बिखराव के साथ ही उत्तराखंड की जनता के संघर्ष और आशा-निराशा का वर्णन भी यहाँ है।