Dhruvswamini by Jaishankar Prasad (Grade-A)
यह नाटक गुप्त साम्राज्य के राजा रामगुप्त, उनकी पत्नी ध्रुवस्वामिनी और उनके वीर भाई चन्द्रगुप्त के इर्द-गिर्द घूमता है. रामगुप्त एक कायर, विलासी और अयोग्य शासक है, जो अपने राज्य को बचाने के लिए अपनी स्वाभिमानी पत्नी ध्रुवस्वामिनी को शत्रु शकराज के शिविर में उपहार स्वरूप भेजने के लिए तैयार हो जाता है. प्रसाद जी ने इस नाटक के माध्यम से पारंपरिक पितृसत्तात्मक समाज के कड़े नियमों पर तीखा प्रहार किया है, जहाँ नारी को केवल पुरुष की संपत्ति समझा जाता है. ध्रुवस्वामिनी इस अपमानजनक निर्णय का पुरजोर विरोध करती है और पुरुष-प्रधान समाज की उस व्यवस्था को चुनौती देती है जो एक स्त्री को उसकी इच्छा के विरुद्ध किसी वस्तु की तरह इस्तेमाल करने की अनुमति देती है. अंततः कुमार चन्द्रगुप्त के साहस और ध्रुवस्वामिनी के आत्म-सम्मान की विजय होती है, जहाँ वे न केवल शकराज का वध करते हैं बल्कि कायर रामगुप्त के वैवाहिक बंधन से मुक्ति पाकर नारी के पुनर्विवाह और गरिमापूर्ण अधिकारों की रक्षा करते हैं. यह नाटक न केवल पुरुष-मौन की आलोचना करता है बल्कि भारतीय रंगमंच पर स्त्री-विद्रोह और नारी चेतना की एक ऐतिहासिक मिसाल पेश करता है.
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